कोई है राह में तो कोई अपने घर में है
हर आदमी मगर किसी अंधे सफर में है
धरती का जिस्म सरहदों में काटने के बाद
अब आसमां का चाँद भी उनकी नज़र में है
पंछी वहीं पे लौट के आते हैं बार बार
ऐसी भी बात कौन सी बूढे शजर में है
शायद वहाँ पे हो 'रवि' मिट्टी बची हुई
बाकी हमारा गाँव तो सारा शहर में है
Saturday, March 8, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment