मुझे छू कर गया है जो अभी एहसास बाकी है
किसी के लौट आने की ज़रा सी आस बाकी है
इसी उम्मीद में काटा है पतझड़ आज तक हमने
अभी ऋतुएं बदलनी हैं अभी मधुमास बाकी है
अभी तक तो हुई हैं आपसे कुछ आम सी बातें
मगर जो बात कहनी है बतौरे ख़ास बाकी है
कभी सबकुछ मिला होने पे भी सबकुछ नहीं मिलता
समंदर के लबों पर आज तक भी प्यास बाकी है
सुबह होते ही सारे ख्वाब माना टूट जाएँगे
अभी सारी की सारी रात मेरे पास बाकी है
भले हों बेजुबां उनको भी वो भूखा नहीं रखता
गिरे हैं आँधियों से पेड लेकिन घास बाकी है
Saturday, March 8, 2008
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4 comments:
रवीन्द्र जी आपकी सभी गज़लें बहुत ही खूबसूरत हैं...दिल में उतरती हुई सार्थक रचना..बहुत-बहुत बधाई !
रवींद्र जी, सुंदर ग़ज़लें लिखी है. इस ग़ज़ल के इस शेर ने तो मन मोह लिया-
"इसी उम्मीद में काटा है पतझड़ आज तक हमने
अभी ऋतुएं बदलनी हैं अभी मधुमास बाकी है."
ढेर सारी शुभकामनाएँ आपके ओर आपके लेखन के लिए.
भाई रवि जी, आपके ब्लॉग पर पहली बार आया हूँ। गोष्ठियों में तो आपकी बेहतरीन ग़ज़लें सुनते ही रहते हैं, अब आपके ब्लॉग पर पढ़ने को भी मिलीं। अच्छा लगा। इसे जारी रखें। मेरी शुभकामनाएं…
हां, एक बात…
कमेंट्स बाक्स से वर्ड वैरीफिकेशन की बंदिश हटा दें। इससे कुछ नहीं होता… मैंने अपने सभी ब्लॉग्ज से हटा रखी है… पाठकों को टिप्पणी छोड़ने में दिक्कत होती है।
सुभाष नीरव
9810534373
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