मुझे छू कर गया है जो अभी एहसास बाकी है
किसी के लौट आने की ज़रा सी आस बाकी है
इसी उम्मीद में काटा है पतझड़ आज तक हमने
अभी ऋतुएं बदलनी हैं अभी मधुमास बाकी है
अभी तक तो हुई हैं आपसे कुछ आम सी बातें
मगर जो बात कहनी है बतौरे ख़ास बाकी है
कभी सबकुछ मिला होने पे भी सबकुछ नहीं मिलता
समंदर के लबों पर आज तक भी प्यास बाकी है
सुबह होते ही सारे ख्वाब माना टूट जाएँगे
अभी सारी की सारी रात मेरे पास बाकी है
भले हों बेजुबां उनको भी वो भूखा नहीं रखता
गिरे हैं आँधियों से पेड लेकिन घास बाकी है
Saturday, March 8, 2008
ग़ज़ल
न आज ही मेरा हुआ न कल मिला मुझे
उस पर था अलविदा लिखा जो पल मिला मुझे
कुछ देर को ही साथ रही है मेरे हंसी
जब भी मिला है आंसुओं से बल मिला मुझे
मज़हब के नाम पे वो मुझे लूटते रहे
मैं सोचता रहा कि करमफल मिला मुझे
प्यासी नदी को बात बताता तो किस तरह
पानी को तरसता हुआ बादल मिला मुझे
इन बदहवास रास्तों में खो गया 'रवि'
आया था शहर ढूँढने जंगल मिला मुझे
उस पर था अलविदा लिखा जो पल मिला मुझे
कुछ देर को ही साथ रही है मेरे हंसी
जब भी मिला है आंसुओं से बल मिला मुझे
मज़हब के नाम पे वो मुझे लूटते रहे
मैं सोचता रहा कि करमफल मिला मुझे
प्यासी नदी को बात बताता तो किस तरह
पानी को तरसता हुआ बादल मिला मुझे
इन बदहवास रास्तों में खो गया 'रवि'
आया था शहर ढूँढने जंगल मिला मुझे
ग़ज़ल
कोई है राह में तो कोई अपने घर में है
हर आदमी मगर किसी अंधे सफर में है
धरती का जिस्म सरहदों में काटने के बाद
अब आसमां का चाँद भी उनकी नज़र में है
पंछी वहीं पे लौट के आते हैं बार बार
ऐसी भी बात कौन सी बूढे शजर में है
शायद वहाँ पे हो 'रवि' मिट्टी बची हुई
बाकी हमारा गाँव तो सारा शहर में है
हर आदमी मगर किसी अंधे सफर में है
धरती का जिस्म सरहदों में काटने के बाद
अब आसमां का चाँद भी उनकी नज़र में है
पंछी वहीं पे लौट के आते हैं बार बार
ऐसी भी बात कौन सी बूढे शजर में है
शायद वहाँ पे हो 'रवि' मिट्टी बची हुई
बाकी हमारा गाँव तो सारा शहर में है
ग़ज़ल
दिल में है कोई बात तो आओ गिला करो
जब भी मिला करो हमें खुल कर मिला करो
वो भी हँसेगा आप अगर मुस्कुराओगे
इक बार शुरू आप ज़रा सिलसिला करो
आना पड़ेगा आपको आखिर ज़मीन पर
चाहे किसी मकान को सौ मंजिला करो
रखदे न बात बात में जड़ से उखाड़ कर
इन सरफिरी हवाओं से न यूँ हिला करो
सबका नसीब एक सा होता नहीं 'रवि'
खारों को किस तरह कहें तुम भी खिला करो
जब भी मिला करो हमें खुल कर मिला करो
वो भी हँसेगा आप अगर मुस्कुराओगे
इक बार शुरू आप ज़रा सिलसिला करो
आना पड़ेगा आपको आखिर ज़मीन पर
चाहे किसी मकान को सौ मंजिला करो
रखदे न बात बात में जड़ से उखाड़ कर
इन सरफिरी हवाओं से न यूँ हिला करो
सबका नसीब एक सा होता नहीं 'रवि'
खारों को किस तरह कहें तुम भी खिला करो
ग़ज़ल
पूरा किसी को ज़िन्दगी का हल नहीं मिला
सर को मिला तो पाँव को कम्बल नहीं मिला
सर को मिला तो पाँव को कम्बल नहीं मिला
हमसे ही कुछ बहार को नाराजगी रही
जब भी लगाए पेड़ कभी फल नहीं मिला
चेहरे पे उसके आज भी चेहरा किसी का है
जब भी मिला वो मुझको मुकम्मल नहीं मिला
सागर की आँख सूख न पायी तमाम उम्र
सेहरा को बरसता हुआ बादल नहीं मिला
कैसे मैं छोड़ दूँ भला उम्मीद ये 'रवि'
मिल जाये आज क्या पता जो कल नहीं मिला
ग़ज़ल
कहीं से लौट कर कोई सदा मुझ तक नहीं आई
मुझे बहरा न कर डाले कहीं मेरी ये तन्हाई
किया था हौंसला हमने भी छूने का उसे लेकिन
कि शातिर आसमां अपनी बढा लेता है ऊंचाई
शिकस्ताहाल का मतलब नहीं कि हार बैठे हम
हमारी जीत की शायद अभी बारी नहीं आई
वहाँ इक गाँव था, कुछ लोग थे, इंसानियत भी थी
यहाँ इक भीड़ है और भीड़ भी सारी तमाशाई
कि भूखों के लिए कुछ रोटियाँ फेंकीं गयीं जैसे
हुई बरसात तो सूखी नदी की आँख भर आई
मुझे बहरा न कर डाले कहीं मेरी ये तन्हाई
किया था हौंसला हमने भी छूने का उसे लेकिन
कि शातिर आसमां अपनी बढा लेता है ऊंचाई
शिकस्ताहाल का मतलब नहीं कि हार बैठे हम
हमारी जीत की शायद अभी बारी नहीं आई
वहाँ इक गाँव था, कुछ लोग थे, इंसानियत भी थी
यहाँ इक भीड़ है और भीड़ भी सारी तमाशाई
कि भूखों के लिए कुछ रोटियाँ फेंकीं गयीं जैसे
हुई बरसात तो सूखी नदी की आँख भर आई
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