Saturday, March 8, 2008

ग़ज़ल

पूरा किसी को ज़िन्दगी का हल नहीं मिला
सर को मिला तो पाँव को कम्बल नहीं मिला

हमसे ही कुछ बहार को नाराजगी रही
जब भी लगाए पेड़ कभी फल नहीं मिला

चेहरे पे उसके आज भी चेहरा किसी का है
जब भी मिला वो मुझको मुकम्मल नहीं मिला

सागर की आँख सूख न पायी तमाम उम्र
सेहरा को बरसता हुआ बादल नहीं मिला

कैसे मैं छोड़ दूँ भला उम्मीद ये 'रवि'
मिल जाये आज क्या पता जो कल नहीं मिला

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