सर को मिला तो पाँव को कम्बल नहीं मिला
हमसे ही कुछ बहार को नाराजगी रही
जब भी लगाए पेड़ कभी फल नहीं मिला
चेहरे पे उसके आज भी चेहरा किसी का है
जब भी मिला वो मुझको मुकम्मल नहीं मिला
सागर की आँख सूख न पायी तमाम उम्र
सेहरा को बरसता हुआ बादल नहीं मिला
कैसे मैं छोड़ दूँ भला उम्मीद ये 'रवि'
मिल जाये आज क्या पता जो कल नहीं मिला
No comments:
Post a Comment